यादों की तिजोरी
जगन्नाथ प्रसाद बर्मन के कुछ हसीन पल—
गर्मियां और मेरा रिश्ता हमेशा से थोड़ी नोंकझोंक, प्रेम की एक इत्तेफाकी लहर और पहाड़ी लोगों के प्रति आंतरिक ईर्ष्या से भरा हुआ रहा है। मौसम से मेरी कुछ शिखवें हमेशा हैं, लेकिन इस संदिग्धता के प्रश्न चिन्हों से भरी और खुशनुमा यादों से सजी मौसम की तिजोरी के बीच—या फिर भीतर, यह मौसम की मुख्य यादें हमेशा गर्मियों की छुट्टियां रहेंगी। इस रुखे और बेजान से नजर आने वाले मौसम को हमेशा से मैने अपने धैर्य और परिश्रम से सजाया है; माना कि इसकी छवि थोड़ी सी बदनाम है और सूरज की कठोर किरणों के कुछ क्षणों में ही किसी शीत जगह जाने का मन बनने को देर नहीं लगती—पर जब लोग कहते है कि गर्मियां एक जीवित पशु में से उसकी सारी जान छीन लेती है, तो मेरे अंदर कैद जज़्बाती क्रिकेट प्रेमी को चोट सी लग जाती है।
वह लड़का जो मई की रूह सूखा देने वाली धूप में भी सर पे लाल टोपी, हाथ मे एक माज़ा की छोटी बोतल और अपना पुराना कूकाबूरा का बल्ला लिए उन डामर की चमकती गलियों पर उतरता था, सहसा आपकी बात को नकार देता। उस बच्चे के लिए गर्मी की भीषणता किसी वरदान से कम नहीं थी; जब हवा इतनी रुखी हो कि गले में बसा जल अंदर से आपको काटने लगे, तो कोई क्यों भला बाहर निकलेगा? और इसी आपदा का फायदा उठाए, सारे भारतीय क्रिकेट वीर, रेलवे कॉलोनी के पुराने शेड के बगल में इकट्ठा होते थे। शायद मेरी जान दोपहर की उस निर्दय लू में बसी थी, या फिर उस पुराने बल्ले में। आज ना वह बल्ला है ना इस लू को अपने अंदर समा लेने का साहस, बड़े होने के रस्ते के बीच यह दोनों मेरी कैप्री की जेब से कही फिसल से गए है। मुझे शंका है यह हीरे अब मेरी जेब में ना लौटेंगे।
मेरा जन्म मध्य प्रदेश के एक ऐसे कस्बे में हुआ था जो अपने आप को एक बड़ा शहर होने का दिखावा करता था। मेरी भावना भले चुभ सकती है, लेकिन में मानता हूं कि वह शहर आज भी एक कस्बा है, और शायद हमेशा रहेगा—मेरे लिए। जब भी कोई मित्र मेरे जन्मस्थल की गाथा सुनने की इच्छा रखता है, मेरे शब्दों में अहमदाबाद का उल्लेख होने में केवल कुछ क्षण लगते है। लेकिन यह सवाल कानों में बजते ही एक परीक्षा का न्योता लेकर आता है—सामने उपस्थित व्यक्ति को पूरी कहानी बताई जाए, या फिर सिर्फ यह कह के निपटा दिया जाए कि मैं तो एक गुजराती हूँ?
इन जन्मस्थलों की कश्मकश के बीच फसा मैं, ज्यादातर खुद को एक गुजराती प्रस्तुत करना पसंद करता हूं। मैं मानता हूं कि में बेहद भाग्यशाली हूं, हर किसी को खुदको एक अहमदाबादी बताने का अवसर नहीं मिलता। माना कि मेरा जन्मस्थल इस शहर से १५०० किलोमीटर दूर एक दिखावटी शहर में बसा है; लेकिन उस शिशु की पहली लुब-डूब से लेकर, मणिनगर रेलवे स्टेशन पर पैर रखने तक, मेरा अस्तित्व कही खोया सा हुआ था। इस शहर की गलियों ने मुझमें जीवन प्रभावशाली अंश भरे है, और शायद थोड़ी दिल की धड़कनें भी।
स्कूल के दिनों के प्रति तो इतनी कुछ खास यादें अंर्तगत छिपी नहीं है, लेकिन आनंद का असली महासागर तो परीक्षाओं की वह हाथ को त्रस्त करदेने वाली, हर एक घंटे में बजती लोहे की घंटी—की आखरी आवाज़ के उपरांत प्रकट होता था।
आखरी पेपर को फाड़ कर निर्दयी मौत देने पश्चात से लेकर, नौरोजाबाद की खड़कती पटरियों तक, पेट में अलग सी गुदगुदी सी छाई रहती थी। ये वह रेलवे स्टेशन था जो मेरे नानी-नाना के घर, बिरसिंहपुर, के रस्ते में एक कदम पीछे था। ट्रेन से आते समय जुहिला नदी के नज़ारे हमेशा मेरा दिल जीत लिया करते थे। उन धुंधली तस्वीरों में कही दूर एक पंडित सूर्य देव को जल अर्पण कर रहा होता था; नदी के बीच कुछ मुस्कराते मछुआरे अपने जाल में किसी मछली का फंसने का इंतजार करते हुए, एक दूसरे की पंचायत को एक कान प्रकट कर रहे होते थे, ट्रेन के पुल के नीचे कुछ भैंसे, गाय और भेद बकरे गर्मी की लड़ाई से मुंह मोड़कर नदी किनारे आश्रय लिए होते थे। और कुछ गोताखोर अपनी शरीर की कला का खेल दिखाते हुए पूल के किनारे से नदी में छलांग लगाते हुए दिखाई पड़ते थे।
इन नज़ारों का गर्मी से एक खास रिश्ता इसलिए था क्योंकि वे यह दर्शाते थे कि अम्मा और बाबू उस पीले पत्थर से सजे पुराने रेलवे स्टेशन पर मेरा इंतजार कर रहे होंगे। नानी को अम्मा और नाना को बाबू बोलने की मेरी गलती को उन दोनों ने कभी सुधारने की कोशिश नहीं करी। ये आदत मैने अपनी माँ की बोली से चुराई थी और शायद इसकी खूबसूरता मुझे अब थोड़ी-थोड़ी समझ आ रही है। बचपन की इस नादानी को किसी ने ठीक करने की जुर्रत की नहीं, क्योंकि अम्मा और बाबू को यह बहुत पसंद था, मैं भले उनका नाती था लेकिन उन्होंने मुझे कभी अपने चौथे बच्चे से कम महसूस नहीं करवाया—शायद यही नाती होने का मीठा सौभाग्य है। एक बार अम्मा की दूधवाली ग्वालिन ने मुझे इस बात पर डांट दिया था कि में उन्हें अम्मा न बोलूं, तब अम्मा बाबू ने उससे एक हफ्ते तक दूध नहीं लिया था।
हर स्टेशन को सम्मानित करती हुई नर्मदा एक्सप्रेस, जब पाली की पटरियों पर अपना नमस्कार दर्शाती थी, तब दूर कही ट्रेन से उतरते हुए मुझे मेरे दोनों मामा, अम्मा और बाबू की झलक ऐसी खुशी देती थी कि में अपने स्थल पर थम सा जाता था। उनको देखने के पहले क्षणों में विश्वास ही नहीं होता था कि मैं सच में उनके समक्ष उपस्थित हूं। जीवन के कुछ पल ऐसे होते है जब आप खुदको कितनी भी ज़ोर से चूटी काट लें, वह लम्हा आपको असली नहीं लगता। ऐसा लगता है यह सब किसी सुबह के अलार्म से टूट जाने वाला अविश्वसनीय सपने का हिस्सा है। मेरे जीवन के कुछ ऐसे लम्हों में ये दृश्य बहुत खुशी से निवास करता है।
बाकी किसी के कपड़े मुझे याद नहीं है, क्योंकि अम्मा और मामा हर साल अलग-अलग कपड़ों में आते थे। परन्तु बाबू की झलक हमेशा एक सी ही रहती थी। सफेद बालों को सरसों के तेल से पीछे व्यवस्थित कंघी किए हुए, चेहरे पर चुभती दाढ़ी को चुन चुन के हटाकर, अपनी चौड़ी छाती पर एक नई प्रेस की हुई सफेद कमीज़, और उसके नीचे एक सीधी काली और बारीकी से सिली हुई मार्डन पतलून—या पैंट पहनकर, चेहरे की झाइयां छुपा देने वाली एक बेफिक्री मुस्कान के साथ हमारा स्वागत करते थे।
बाबू की मुस्कान को देख कर लगता था कि उनके जैसे व्यक्ति तो दुःख के बोझ से परे है—भला एक हमेशा चंचल आदमी के जीवन में ज्यादा से ज्यादा क्या ही कठिनाइयां हो सकती है? लेकिन मेरी कच्ची उमर के थोड़े से अनुभव ने मुझे बताया है कि आदमी इसलिए नहीं मुस्कराते क्योंकि वह खुश है, वह इसलिए मुस्कुराता है ताकि वह दूसरों पे अपनी कठिन परिस्थितियों की कड़वाहट न छिड़क दे।
कभी कभी मैं, माँ और मेरी बहन खुशी, अपने साथ केसरी आम की पेटियां लेकर आते थे। उस आम की पेटी को लाने का उद्देश्य यह नहीं था कि पाली में आम अच्छे नहीं मिलते, बल्कि हमारे घर के बाजू में तो एक विशाल आम का वृक्ष पहले से था। उन पेटियों को लाने का असली कारण थे मेरे बाबू। केसरी आम पाली में कम ही मिलते थे, और गुजरात में काफी प्रख्यात थे। अपने कच्चे हाथों में वह दोनों आम की पेटी पकड़ कर बाबू के लिए लाना मानो एक त्यौहार सा बन गया था।
मैं बार बार बिरसिंहपुर को पाली इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बाबू इस जगह को इस नाम से पुकारते थे। वैसे तो माँ बिरासिनी देवी के अमृत धाम का यह नाम १००० वर्ष पुराना है—लेकिन इधर के निवासी और आस पास के लोगों ने जगह को पाली नमक उपाधि देदी हैं। मुझे खुद तो ये नाम पसंद नहीं हैं, लेकिन बाबू कहा करते थे इसलिए इस संक्षेप में मेरे नानी-नाना के घर को पाली ही पुकारूंगा। कभी कलम ने इजाजत दी तो पाली नाम के प्रति मेरी घृणा के बारे में भी लिखूंगा।
रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद, अपने सामान को अम्मा बाबू के पीछे खड़े मामा को सौंप कर एक अलग राहत की अनुभूति होती थी, ऐसा लगता था किसी जंग की आखरी शहनाई बजाकर समापन का ऐलान कर दिया हो। आज जब मामा मुझे स्टेशन लेने आते है, तो मेरे बैग को उन्हें थमा कर मुझे थोड़ी शर्म सी आने लगती है। शायद मेरे बढ़ते कद के बीच इस समाज ने मेरे अंदर धीरे धीरे शर्म, घृणा, और दुःख जैसे तत्वों के बीज बो दिए; बाबू को देखकर हंसने वाले आयुष में ऐसा कुछ नज़र नहीं आता था। लेकिन मैं मानता हूं कि जितना जरूरी जीवन में खुशी के पलों का होना है, उतना ही दुखी क्षणों का भी है—बिना जीवन की करेले सी कड़वाहट के, उसकी आम सी मिठास का क्या फायदा? इन कुशल लम्हों की चमक जीवन की कठिनाइयों के अंधेरे से और नुमाया हो जाती है। जिस जीवन में दुःख न हो, वह सुख का पूर्ण स्वाद कभी चख ही नहीं सकता।
बिरसिंहपुर के पीले पथरीले बोर्ड के उस पार, एक छोटा सा पुराना गेट फांद कर जब स्टेशन से बाहर निकलते है तो अम्मा बाबू का घर एकदम साफ तरीके से आंखों पर प्रभाव करता है। स्टेशन से केवल कुछ कदम दूर चलकर ही उस घर का काला लोहे का गेट पेहरेदारी करता हुआ आज भी नज़र आता है। आप विश्वास नहीं मानेंगे लेकिन वह गेट हमें देख कर मुस्कुराता था, अगर वह बात कर पाता तो शायद मेरे स्वागत में शायरियां सुना देता। आंगन में बसे छोटे बगीचे में चमेली, गेंदे, कमल और तीन प्रकार के गुलाब के फूलों के अलावा एक अमरूद का बड़ा पेड़ और पान की फैली हुई पत्तियां की सुगंध अभी भी उपस्थित रहती है। बाबू को सफेद गुलाब का फूल काफी पसंद था। उन कोमल गुलाब की पंखुड़ियों को सुबह सुबह पूजा करते हुए वे शिवजी के समीप विभाजित करते थे।
बताने को तो मेरे पास बाबू की यादें थोड़ी कम सी महसूस होती हैं, बचपन में शायद जीवन जीने में बच्चे इतने व्यस्त हो जाते हैं, कि वे उन पलों को याददाश्त में पिरोना भूल जाते हैं जो उनकी मुख्य यादों का हिस्सा बन सकते हैं। शायद इसीलिए मुझे अपने और बाबू की कहानियां थोड़ी कम ही याद है।
अम्मा बताती है की बाबू मुझे पूरे घर से छुपा कर फाटक पार स्थित लल्लू पनवाड़ी के पास लेजाते थे, क्योंकि मुझे चॉकलेट और टोफी खाना बहुत पसंद था। बाबू और मेरी इस चालाकी की वजह से हमें बहुत बार डांट भी पड़ती रहती थी, मेरे दांतों के पिछले हिस्से में अभी भी एक कैविटी मौजूद है—जो मेरे अंदर बाबू की एक आखरी निशानी की तरह उपस्थित है। अम्मा ने जब ये किस्सा सुनाया, तो मेरी याददाश्त में मानो एक प्रकाश सा उत्तेजित हुआ। बाबू के साथ दोपहर में घर से छिप कर निकलने की कोशिश अब मुझे ज्यादा अच्छे से याद आती है। आज भी जब उस कैविटी में खाने का कोई टुकड़ा फंस जाता है तब बाबू की मुस्कुराती तस्वीर मुझे अपने नेत्र समक्ष प्रकट होती है। हालांकि इस याद की वजह से मैं एक दुविधा में फसा हूं, बाबू की इस आखरी निशानी को डॉक्टर के क्रूर हाथों को सौंप दूं—या फिर इस परेशानी को गले लगाकर अपन हिस्सा मान लूं? दोनों के ही अपने फायदे और नुकसान है। कभी कभी तो लगता है कि में कुछ ज्यादा ही सोचता हूं, क्योंकि यह बाबू की अकेली निशानी नहीं हैं, बस ये थोड़ी सी ज्यादा नज़र आती हैं।
मेरी बहन को चुक्की और मुझे आलू कहने वाले बाबू का नाम खुद बहुत ही निराला था। जगन्नाथ प्रसाद बर्मन जैसा भारी नाम की विराटता को बाबू ने एक मज़ाक सा बना दिया था। उमरिया जिले के मुख्य अध्यापकों में से एक—जगन्नाथ प्रसाद बर्मन एक बहुत ही नेक दिल, ईश्वर प्रेमी और कठोर मेहनती व्यक्ति थे। बाज़ार में उनके साथ निकलना मतलब अपने सम्मान का एक लंबा टीका पहन कर निकलने जैसा था।
बाबू अम्मा को बेइंतहा प्रेम करते थे—इसलिए आज भी में कभी उस घर का नाम लेता हूं, तो हमेशा अम्मा के नाम को पहला स्थान देने में संकोच नहीं करता। वह घर हमेशा से अम्मा का ही था, और शायद भगवान ने भी कुछ वर्षों में इस तथ्य को स्वीकार लिया। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे घर का अंशु हूं जहां महिलाओं की बहुत इज्ज़त रही है। इस घर की दीवारों और बगल के मोहल्लों में कभी किसी ने अम्मा को बाबू से कम नहीं समझा—भगवान ने तक नहीं!
बाबू की एक खासियत थी जो उन्हें बाकी सभी परिवार वालों से अलग करती थी, वे किसी भी व्यक्ति को—भले उसने कितना भी बुरा किया हो, एक वक्त के बाद माफ कर देते थे। आज थोड़ा खुद में झांका तो पता चला कि मेरे अंदर किसी के प्रति भी गहरी घृणा न होना और मेरे चेहरे की मुस्कान का इतना चौड़ा होना, दोनों मेरे बाबू की देन है।
क्रिकेट प्रेमी बर्मन जी अक्सर रात को अपने पुराने दीवान पर बैठकर आई.पी.एल. और भारत के मैचों को अनंत रुचि से देखते थे। धोनी को देखने का भूत इस कदर सवार था कि मैच चलते समय अपना खाना भी अक्सर उस पुराने सी.आर.टी. टीवी डब्बे के सामने बैठकर खाते थे। २०१० में जब चेन्नई सुपर किंग्स ने पहली बार आई.पी.एल. जीता था, तब उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, बचपन की तेज आंखों से देखी हुई बाबू की वह जश्न भरी चाल, शायद मेरे चेन्नई और धोनी का फैन बनने का मुख्य कारण हैं। उस पुराने टीवी डब्बे में मैने चेन्नई के चार और धोनी के पांच फाइनल देखे है, दुःख की बात यह है कि बाबू केवल २ बार ही चेन्नई को जीतते हुए देख पाए।
बाबू के चचेरे भाई के बड़े बेटे की शादी गर्मी में तय हुई थी। हम सब की मौजूदगी पाली में होने के कारण, उन्होंने ने सह परिवार आने का बाबू को न्योता दिया। मेरी तबीयत थोड़ी खराब सी थी, और में अपनी खराब हालत की वजह से चल फिर नहीं पा रहा था। तब बाबू ने पूरी शादी के दिनों में मुझे अपनी गोदी में बिठा कर घुमाया, एक क्षण के लिए भी मेरी माँ के सिवा किसी को छूने नहीं दिया—अम्मा तक को नहीं। ऐसे थे मेरे बाबू और ऐसी थी उनकी और अम्मा की जुगलबंदी।
२०१२ की एक रात को उनके सीने में कुछ ऐसा दर्द उठा की वह उन्हें पूरा निगल सा गया। घबराहट और चिंता से हड़बड़ाते हुए दोनों मामा ने उन्हें करीबी शहडोल के अस्पताल में लेजाना ठीक समझा। उधर जाकर पता चला कि उनका इलाज वहां असंभव है। परेशान और हारे हुए मामा ने उन्हें ट्रेन में बिठा कर नागपुर लेजाने की महान कोशिश करी—पर रास्ते में उनके दिल ने दम तोड़ दिया। शायद जीवन का यह ही सत्य है कि मृत्यु दूसरे के परिवार में जितनी आम और अनिवार्य लगती है, जब आपके परिवार में हो, तो उससे बड़ा कोई दुःख नहीं लगता। माँ की घर से दूरी की वजह से वह बाबू के अंतिम संस्कार में न पहुंच सकी, और उनको यह दुर्भाग्य जीवन भर सताएगा।
अब इस अकस्मात का कारण पाली में इलाज केंद्रों की कमी को बताऊं, या निकम्मी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा अभिशाप को, या फिर बाबू की खुदकी बीमारी को नज़रअंदाज करने की नादानी को। हर मृत्यु का एक अंतिम तथ्य यह है कि मृत्यु के उपरांत व्यक्ति वापस नहीं आता, चाहे आप किसी को भी दोषी साबित कर दिया जाए।
•रामधारी सिंह दिनकर कहते है:
"क्षमा शोभती उस भुजंत को जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन विष रहित, विनीत सरल हो"
शक्ति और क्षमा का नाता कुछ ऐसा है कि जिसकी पकड़ पहली पर हो उसी को दूसरी शोभा देती है। एक सांप जो ना जहरीला हो, ना काट सकता हो, और सरलता की भावना रखता हो, उसकी क्षमा का अर्थ रत्ती भर भी नहीं है। ईश्वर की शक्ति इतनी अपार है कि उसने अपने भक्तों से क्षमा मांगना छोड़ दिया है, और बाबू के निधन का शोक घर में इतना बड़ा था कि शायद ईश्वर की क्षमा से ही मिट पाता। क्योंकि हरि की क्षमा हर किसी को नहीं मिलती—इसलिए शायद हमारे घर पधार जाती तो हम मान लेते की बाबू की इस अजीब अलविदा का कोई धार्मिक अर्थ हैं। लेकिन हमारे प्यारे प्रभु ने अपने कानों पे एक मोटा ताला लगा रखा है।
मृत्यु से विशाल तथ्य को समझने लायक मेरी उम्र नहीं थी, तब घरवालों ने बताया कि बाबू कही दूर गए हैं। जब थोड़ी बुद्धि आई तो ईश्वर से सवाल करने में मैने बिल्कुल देरी नहीं की—"हे ईश्वर! तेरे दरबार में नेकी करने वाले चापलूसों की कमी हो गई थी जो तूने मेरे बाबू को अपने पास बुला लिया? क्या यह ही तेरी मृत्यु का कठोर सत्य?
अगर ऐसा ही है, तो दानव समान कपटी मनुष्यों जिनको पैदा होने का कोई हक नहीं है—वे क्यों इतनी लंबी उम्र का आनंद उठाते हे? बाबू की अच्छाई का बहाना बनाकर तूने उन्हें ५० वर्ष की कम उम्र में अपने दरबार में सजा दिया? बोलो ना प्रभु शब्द नहीं है क्या!!"
क्रोध मुझ में भरा हुआ था और शायद अभी भी है। मुझे पता है ईश्वर से मेरी नाराजगी के पुल उसी दिन बंध गए थे जब उसने बाबू जैसे नेक व्यक्ति को अपने होने वाले तीन नातियों को खिलाने वाले सुख को उनकी मृत्यु से नकार दिया था।
आज अम्मा का घर थोड़ा सा अधूरा सा लगता है, बच्चे, मामा-मामी और बगीचे के बावजूद ऐसा लगता है कि घर की एक मुख्य दीवार गायब है। बाबू के पसंदीदा सफेद गुलाब अब थोड़े ज्यादा ही खिलते है, क्योंकि उनको प्रभु को पेश करने वाले खुद मृत्यु को अर्पित हो चुका है। बाबू के निधन के बाद बड़े मामा को उनकी सरकारी नौकरी मिली, क्योंकि उस जिले में और उनसे श्रेष्ठ कोई और नहीं था।
घर के ऊपर दो नए कमरे बन तो गए हैं लेकिन छत पर जो मातम का साया है वो आज भी कभी कभी दस्तखत दे देता है। मृत्यु के बाद आदमी की याद थोड़ी थोड़ी दिमाग से मिटने सी लगती है, शायद में यह संक्षेप थोड़े वर्षों पहले लिखता तो और भी कुछ यादें कागज पर उतार पाता, लेकिन में मानता हूं कि हर कार्य का एक समय होता है और शायद इस लेख का समय आज था।
आज ए.सी. की बर्फीली हवा में बैठ कर अपनी खिड़की से नीचे तपती हुई धूप को निहारते समय वो पल याद आता है जब बाबू पाली में लाइट गुल होने की वजह से, बिजली विभाग में शिकायत करने चले गए थे क्योंकि गर्मी ने मुझे सूखा दिया था। उस हाथ के घूमने से हवा देने वाले पंखे की हवा भले ठंडी नहीं होती थी, पर उसके भीतर बसे प्रेम की क्षमता इतनी थी कि बिजली विभाग के सरकारी अफसरों को भी बाबू के सामने हाथ जोड़ने पड़े।
कल चेन्नई सुपर किंग्स का मैच देखते समय मुझे यह ख्याल आया कि अगर बाबू होते तो कितनी रुचि से इस बदलते टी.२०. फॉर्मेट को देखते। माना कि चेन्नई की हालिया प्रदर्शन से वे थोड़े नाराज़ होते पर उनकी खुशी मेरे हिसाब से आज कल के हाई-स्कोरिंग मैचों में अपार होती। मैंने देखा है कि आदमी के इस धरती से विदा लेने के बाद ही अक्सर हमे उनसे जुड़े हमारी हरकतें, यादें और उनसे प्रेरित हमारे चरित्र की इमारतें कुछ ज्यादा नज़र आने लगती हैं। मनुष्य एक बहुत ही अहसान फरामोश प्रजाति है, जब तक एक अपना उनसे छीन नहीं जाता, तब तक उनको उनके अस्तित्व की खुद से उलझी डोरियाँ कम ही नज़र आती है।
अगर बाबू आज होते तो ये लेख पढ़ कर बहुत खुश होते, पर यह लिखते समय मुझे अचानक ध्यान आया कि अगर वे आज होते तो शायद में यह लिख ही न रहा होता। बड़ा निराला है आभार भावना जताने का कार्य, इसको जब तक किसी क्रूर परिस्थिति या एक कम खुशी देने वाले पल से तुलना न करी जाए तो यह भाव थोड़ा हल्का पड़ जाता है।
लिखने को बातें कम पड़ गई है और इतना बड़ा में था नहीं कि बाबू को अपने प्रेम का इज़हार कर पाता, इसलिए शायद आज इतने वर्षों के बाद इस छोटे लेख में अपना दिल परोस के मैने रख दिया है। मुनीर नियाज़ी की इन पंक्तियों में शायद मेरा भाव अच्छे से कैद होता है और इन्हीं से मैं आपसे बाबू की यादों में अलविदा लेता हूं:
मदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना हो
बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं
बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं
किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो
हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में…
Thanks a lot to everyone who has read so far :)



what a heartfelt post, i cried through out, for you and i both. i know how much you love babu and it was very evident in this writing. made me remember my nana. beautiful writing chodya, very proud of you for this. 🫂❤️
told you, you'll be back w a banger!
bhai please keep posting in hindi — this was so beautiful. i love reading hindi, added a layer of adoration because i know you a bit. i was absolutely blown away by the way you described the scenes you set up. it’s like every landscape carried with it its own sense of nostalgia and longing. thank you for posting, i feel so lucky to read this. beautiful beautiful! also, i love my grandparents too so it made me a little too emotional since i could see the way age makes us a little distant but the love is so omnipresent! goddamn imma bawl!